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हिंदी भाषा और सिनेमा

     हिंदी के प्रचार– प्रसार में हिंदी सिनेमा की भूमिका। वैश्वीकरण के इस दौर में हिंदी को वैश्विक रूप प्रदान करने में हिंदी सिनेमा का महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भारत अग्रणी देशों में है।कलात्मक रूप में व्यक्ति के अंतःकरण को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख माध्यम फिल्में है।इसके द्वारा जीवन के सभी पक्षों को सजीव एवम जीवंत बनाया जाता है।सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक क्रांति,लोक जागरण की दिशा में यह सबसे कारगर जनसंचार माध्यम है।इसके द्वारा प्रसिद्ध कहानी,नाटकों,उपन्यासों को जनसाधारण तक पहुंचाया जाता है।       हिंदी तथा हिंदी सिनेमा एक दूसरे को कई बिंदुओं पर प्रभावित करते है।जो हिंदी के प्रसार में सहायक है।हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों का सिनेमा रूपांतरण हुआ है। जो समाज में एक खासा प्रभाव छोड़े है।जो आज भी बहुत लोकप्रिय है।केशवप्रसाद मिश्र की उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’पर ‘नदिया के पार ’ फिल्म बनी,जिसने समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया।अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ पर बनी फिल्म ‘गदर:एक प्रेम कथा’,मोहन राकेश की कहानी ‘मलबे का मालिक’ ...

राहुल सांकृत्यायन

 ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’, जैसा क्रांतिकारी नारा देने वाले दुनिया के सबसे बड़े घुमक्कड़ नेता महाविद्रोही,महापंडित राहुल संस्कृत्यायन दार्शनिक , विचारक, इतिहासकार, पुरातत्वेता, साहित्यकार भाषा शास्त्री और मार्क्सवाद प्रचारक हो ने के साथ ही एक लोकप्रिय जननेता भी थे।स्वाधीनता आंदोलन और बिहार के किसानो के आंदोलन में उन्होंने प्रत्यक्षकारी भूमिका निभाई। राहुल सांकृत्यायन की परंपरा सतत प्रगति और प्रयोग तथा सामाजिक सांस्कृतिक क्रांति के अविरल प्रवाह एवं जनता से अटूट जुड़ाव की परंपरा है। राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। वह वेदान्ती, आर्य समाजी, बौद्ध मतावलंबी से होते हुए मार्क्सवादी बने। विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने पूरी तरह से ब्राहमणवादी जातिवादी हिंदू–संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया। फुले और आंबेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का व्यक्तिगत तौर पर तो सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिंदुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी। राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हि...

विकसित भारत में उपन्यासों का योगदान

“विकसित भारत में उपन्यासों का योगदान।”  प्रस्तावना– भारत, एक बहुभाषीय, बहुसांस्कृतिक और विविधता से भरे देश के रूप में, अपनी साहित्यिक परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध है। इस विविधता और समृद्धि में उपन्यासों का योगदान अति महत्वपूर्ण है। उपन्यास साहित्य की एक ऐसी विधा है, जो न केवल मनोरंजन प्रदान करती है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी विचार-विमर्श को प्रेरित करती है। यह शोध लेख विकसित भारत में उपन्यासों के योगदान को विभिन्न पहलुओं से विश्लेषित करने का प्रयास करेगा।  ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य– उपन्यास लेखन की शुरुआत 19वीं सदी में हुई। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का "आनंदमठ" (1882) और प्रेमचंद का "गोदान" (1936) इस विधा के शुरुआती और महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। ये उपन्यास न केवल समाज के विभिन्न पहलुओं को चित्रित करते थे, बल्कि वे सामाजिक सुधारों और राष्ट्रीय चेतना को भी प्रोत्साहित करते थे। 19वीं सदी के उत्तरार्ध और 20वीं सदी की शुरुआत में, भारतीय उपन्यास लेखकों ने उपन्यास को समाज में व्याप्त समस्याओं और सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रयोग किया।  स...

मणि मधुकर

 मणि मधुकर स्वातंत्र्योत्तर भारतीय साहित्य का प्रतिनिधित्व करने वाले विशिष्ट साहित्यकार है। मणि मधुकर का साहित्य एक बदलते हुए युग की तस्वीर को जीवंत रूप देता है। राजस्थान में जन्में और पले बढ़े मणि मधुकर को अपनी मातृभूमि से गहरा अनुराग था ।इसी कारण उनकी रचनाओं में मरूभूमि की मिट्टी की सौंधी गंध विद्यमान है। मणि मधुकर के चार उपन्यासों( सफेद मेमने ,पत्तों की बिरादरी ,मेरी स्त्रियां और पिंजरे में पन्ना )में तीन उपन्यासों के कथानको का घटना केंद्र राजस्थान का मरू अंचल है। सफेद मेमने उपन्यास में अकेलापन ,संत्रास , ऊब ,सेक्स विसंगति और रेगिस्तान की मनहूस जिंदगी को चित्रित किया है ।सफेद मेमने उपन्यास रेगिस्तान के अंतहीन विस्तार पात्रों की मनः स्थिति ,उनके निर्जीव मनहूसियत भरे जीवन की ओर संकेत करता है। मेमने अभिशप्त मानवीय स्थिति को प्रतीकात्मक रूप से सूचित करता है ।इस कृति में सभी पात्र अपनी जिंदगी को मजबूरीवस धोते हैं ।उनके लिए जीवन निरर्थक है ।मणि मधुकर ने राजस्थान के नेगिया गांव के धूल दूसरित स्थिति के माध्यम से आज के अभिशप्त मानव के यथार्थ एवं वास्तविक रूप को उजागर किया है ।समाज के दलि...

महात्मा गांधी के प्रथम सत्याग्रही,आध्यात्मिक शिष्य और भूदान आंदोलन के प्रणेता – विनोबा भावे।

 महात्मा गांधी के प्रथम सत्याग्रही,आध्यात्मिक शिष्य और भूदान आंदोलन के प्रणेता – विनोबा भावे। विनायक नरहरि भावे‘विनोबा भावे’जिन्हें महात्मा गांधी ने 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन के लिए पहला सत्याग्रही चुना था । यही वह पहली घटना है ,जिसने लोगों का ध्यान विनोबा की तरह खींचा था ।महात्मा गांधी के अध्यात्मिक विरासत के सच्चे शिष्य विनोबा भावे का जन्म 11 सितंबर 1895 को महाराष्ट्र के कोंकण क्षेत्र के गागोदा गांव में हुआ था। विनोबा भावे न सिर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे बल्कि सामाजिक कार्यकर्ता और भूदान आंदोलन के प्रणेता भी थे। कम्युनिटी लीडरशिप के लिए उन्हें रेमन मैग्सेस पुरस्कार से  सम्मानित किया गया था ।वह इस श्रेणी में यह पुरस्कार जीतने वाले पहले व्यक्ति थे। विनोबा भावे ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और असहयोग आंदोलन में भी शामिल हुए थे।सरकार ने उन पर ब्रिटिश शासन के विरोध का आरोप लगाकर जेल में भेज दिया।बंदी जीवन में विनोबा जी ने साहित्य साधना की और तीन महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी थी,जिनमें ‘स्वराज्य शास्त्र’,‘स्थितप्रज्ञ दर्शन’,और ईशा वास्य वृत्ति’ प्रमुख रचनाएं थी। गांधी जी ...

लोगों की आस्था की प्रतिमूर्ति है– हमारे राम।

हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता।। लगभग 500 वर्ष पूर्व कही गई यह बात आज भी उतनी ही सार्थक,उचित और प्रासंगिक है। जितनी वह तब थी। भगवान राम की कथा विभिन्न प्रकार से हजारों वर्षों से कहीं जा रही है।भगवान राम युगों - युगों से हमारे देश ही नहीं बल्कि दूनिया के अनेक देशों में जन आस्था के केंद्र में रहे हैं। देश दुनिया के संतों, चिंतकों और विचारकों ने राम पर बहुत कुछ लिखा है। महर्षि वाल्मीकि, तुलसीदास, संत कबीर से लेकर गुरुनानक देव,मीरा, महाकवि केशव, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, महात्मा गांधी आदि सब ने अपने-अपने ढंग से लिखा है। युगों- युगों से राम नाम की आस्था का प्रवाह अविरल रहा है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राम अवतार के उद्देश्य और सिद्धांत को सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है उन्होंने राम को आतिमानवीय रूप में देखा है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो राम को सुख-दुख, करुणा, अन्याय से लड़ने के लिए संघर्ष तक करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया है उनके राम मानवीय-मूल्यों, मर्यादाओं और आदर्शो के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे उदा...