हिंदी भाषा और सिनेमा
हिंदी के प्रचार– प्रसार में हिंदी सिनेमा की भूमिका।
वैश्वीकरण के इस दौर में हिंदी को वैश्विक रूप प्रदान करने में हिंदी सिनेमा का महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भारत अग्रणी देशों में है।कलात्मक रूप में व्यक्ति के अंतःकरण को प्रभावित करने वाला सबसे प्रमुख माध्यम फिल्में है।इसके द्वारा जीवन के सभी पक्षों को सजीव एवम जीवंत बनाया जाता है।सामाजिक परिवर्तन, बौद्धिक क्रांति,लोक जागरण की दिशा में यह सबसे कारगर जनसंचार माध्यम है।इसके द्वारा प्रसिद्ध कहानी,नाटकों,उपन्यासों को जनसाधारण तक पहुंचाया जाता है।
हिंदी तथा हिंदी सिनेमा एक दूसरे को कई बिंदुओं पर प्रभावित करते है।जो हिंदी के प्रसार में सहायक है।हिंदी साहित्य की अनेक कृतियों का सिनेमा रूपांतरण हुआ है। जो समाज में एक खासा प्रभाव छोड़े है।जो आज भी बहुत लोकप्रिय है।केशवप्रसाद मिश्र की उपन्यास ‘कोहबर की शर्त’पर ‘नदिया के पार ’ फिल्म बनी,जिसने समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया।अमृता प्रीतम के उपन्यास ‘पिंजर’ पर बनी फिल्म ‘गदर:एक प्रेम कथा’,मोहन राकेश की कहानी ‘मलबे का मालिक’ पर बनी फिल्म ‘हीना’आज भी हिंदीभाषी और अहिंदीभाषी को प्रभावित करते है।ऐसे ही हिंदी विधाओं पर बनी कई फिल्में है,जो हिंदी को सुदृढ़ आधार प्रदान करते है। इनमें फरिश्वरनाथ रेणु की‘ तीसरी कसम’,मन्नू भंडारी का ‘यही सच है’,भीष्म साहनी का‘तमस’,मंटो का ‘टोबा टेक सिंह’,यशपाल का ‘झूठा सच’, कृष्णा सोबती का ‘जिंदगीनामा’,विजयदान देथा की रचना ‘दुविधा’ आदि अनेक साहित्यिक कृतियों पर फिल्मों का निर्माण हुआ है।
हिंदी सिनेमा में हिंदी की बोलियों और आंचालिकता की अनुगुंज,गीतों का निर्माण और प्रसार देखने को मिलता है।हिंदी गीतों की लोकप्रियता हिंदी भाषा के विकास में अत्यंत सहायक है।हिंदी फिल्मों ने हिंदी साहित्य को आम जनता तक जो हिंदी न भी पढ़ सकते हो उन तक और देश विदेश तक हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में मदत की है।हिंदी साहित्य और हिंदी भाषा का व्यापक प्रचार प्रसार पूरे विश्व में फिल्मों के जरिए हुआ है।
तीसरी कसम’ फरिश्वरनाथ रेणु की महत्वपूर्ण कहानी है।इस पर जब बासु भट्टाचार्य ने फिल्म निर्माण किया तो वह गैर हिंदी भाषियों के लिए भी सहज संप्रेष्य हो उठी। उसमें गानों ने अतिरिक्त ऊर्जा का समावेश करा दिया और उसकी व्यापकता को सुनिश्चित कर दिया।अभिनव,संगीत और दृश्य अंकन ने मिलकर पूरी कहानी का कायाकल्प कर दिया।हिंदी फिल्मों के गीत भी उन लोगों पर अपना प्रभाव डाल देते है,जिन्होंने हिंदी कभी ढंग से पढ़ा नही।हिंदी गीत अपने भिन्न भिन्न प्रकारों के कारण अलग अलग प्रकार के श्रोता वर्ग का कंठहार बने हुए है।हिंदी गीतों में निजी दर्द के साथ साथ राष्ट्रीयता,आध्यात्मिकता,सामाजिक संबंध,कॉमेडीआदि भाव मिलते है।हिंदी गीत ने देश विदेश में लोकप्रियता हासिल करने में सफलता पाई है।कुछ हिंदी के महत्वपूर्ण संगीत जैसे– दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल,मेरे पिया गए रंगून,मेरा रंग दे बसंती चोला, दीदी तेरा देवर दीवाना,तेरी पनाह में हमें रखना, जग सुना सुना लागे।
हिंदी के उपभाषाओं में भी फिल्मों के निर्माण से हिंदी के प्रसार को सुदृढ़ आधार प्रदान किया है। फिल्मी नजरिए से देखें तो भोजपुरी सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपभाषा के रूप में उभरती हैं। भोजपुरी फिल्म का व्यवस्थित निर्माण 1962 में गंगा मैया तोहे पियरी चढइबे से होता है। इसके बाद की अनेक महत्वपूर्ण फिल्म कृतियां कब होई गवनवा हमार ,राखी की लाज ,बलम परदेसिया, गंगा किनारे मोरा गांव आदि फिल्में हमारे सामने आई। भोजपुरी फिल्में न केवल भारत बल्कि मॉरीशस और त्रिनिडाड में भी लोकप्रिय हैं और इस प्रकार हिंदी भाषा के ही रूप का विस्तार कर रही है।
मैथिली भाषा की फिल्में कन्यादान, सस्ता जिंदगी महंगा सिंदूर आदि मैथिली भाषा में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को रचते हैं। हरियाणवी, राजस्थानी छत्तीसगढ़ी सिनेमा भी प्रकारांतर से हिंदी के प्रचार प्रसार को ही बढ़ावा दिया है। हरियाणवी सिनेमा की बहुरानी, सांझी, चंद्रावल, जर जोरू और जमीन जैसी महत्वपूर्ण फिल्मों ने हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पंजाब के हिस्सों में अत्यंत लोकप्रियता अर्जित की ।
सन 2000 में प्रदर्शित लाडो को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। हिंदी बोलियों का सिनेमा अपने सीमित संसाधन और तकनीकी अपरिपक्वता के चलते भले ही कोई अंतरराष्ट्रीय पहचान न बना पाया हो परंतु इन बोलियों की शक्ति बनाएं रखने की संभावना उसने जरूर दिखाई है । बोलियों में बनने वाली सिनेमा हिंदी भाषा को ही समृद्ध करते हुए हिंदी सिनेमा और राष्ट्रीय एकता को दृढ़ता प्रदान करता है। वर्तमान में घोर व्यवसायिक फिल्में भी बन रही हैं जो सिर्फ और सिर्फ मुनाफा चाहती हैं ।इसमें हिंसा , अश्लीलता ,मुनाफाखोरी ,नशाखोरी आदि को बढ़ावा मिल रहा है। फिर भी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक दृष्टि से कारगर भूमिका का निर्वाह कर रही है। हिंदी के प्रचार प्रसार में फिल्मों की भूमिका अत्यंत सराहनीय है। सी. वी. पीटर का कथन है ।“भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ में सिनेमा शायद सबसे अधिक लोकप्रिय है और प्रभावशाली माध्यम है हिंदी फिल्में निश्चित रूप से दूसरी भाषाओं की तुलना में अधिक लोकप्रिय है।” समाज के विभिन्न मुद्दे राष्ट्रीयता, आतंकवाद, सामाजिक ढांचा ,पारिवारिक रिश्ते, औद्योगिकरण, बाजारवाद ,भूमंडलीकरण, प्रवासी जीवन आदि मुद्दे साहित्य में उठते रहते हैं कथानक बनावट और भाषाई अभिव्यक्तियों में हिंदी फिल्में इन मुद्दों के प्रति हमारा ध्यान आकर्षित करती रहती है ।हिंदी फिल्मों ने हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार के साथ हिंदी भाषी समुदाय की चुनौतियों, संघर्ष ,सपने और चाहतों को भी विश्वफलक पर पहुंचाया है ।
हिंदी फिल्मों में विदेश से आए अभिनेत्रियां जैसे कैटरीना कैफ, नरगिस फाखरी, जैकलिन फर्नांडीस हिंदी जाने बगैर हिंदी फिल्मों में काम कर रही है। हिंदी सिनेमा भारत ही नहीं विश्व के अनेक देशों में देखा और पसंद किया जा रहा है। हिंदी गीत अपनी मधुरता के कारण गैर हिंदी भाषी की जुबान पर चढ़ा हुआ है। हिंदी के प्रचार प्रसार में हिंदी के विज्ञापन फिल्मों ने भी अपना योगदान दिया है।
भूमंडलीकरण के इस दौर में अनेक विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में अपना माल बेचने आ रही है। उपभोक्ता को आकर्षित करने के लिए इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विज्ञापन हिंदी में ही बड़े आकर्षक ढंग से रचे गढ़े जा रहे हैं। सिनेमा शुरुआत से ही एक सीमा तक भारतीय समाज का आईना बना हुआ है। जो समाज की हकीकत को बयां करता आया है।बीते दशकों को देखे तो हिंदी सिनेमा ने शहरी ग्रामीण क्षेत्रों की सीमाओं को लांघते हुए वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बनाई है।
टेलीविजन के व्यापक प्रसार के कारण अब विश्व के प्रत्येक भूभाग पर हिंदी फिल्मों और गानों की लोकप्रियता सर्वविदित है।
हिन्दी सिनेमा निश्चित रूप से हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में अपनी विश्व व्यापी भूमिका का निर्वाह कर रहा है।उनकी यह प्रक्रिया अत्यंत सहज,रोचक, बोधगम्य और ग्राहय है।जब हम हिंदी सिनेमा पर दृष्टिपात करते है तो भाषा का प्रचार प्रसार साहित्यिक कृतियों का फिल्मी रूपांतरण ,हिंदी गीतों की लोकप्रियता,हिंदी की उपभाषाआें,बोलियों का सिनेमा और सांस्कृतिक प्रश्नों को उभारने में हिंदी सिनेमा का योगदान महत्वपूर्ण ढंग से सामने आया है।
हिन्दी भाषा की बिंबधर्मितता,प्रतीकात्मकता,संक्षिप्त कथन,दृश्यात्मक,संवाद लेखन,जन संप्रेषणीय रचनात्मक शैली आदि मानकों को हिंदी सिनेमा ने गढ़ा है।भारतीय हिंदी सिनेमा,हिंदी भाषा ,साहित्य और संस्कृति का लोकदूत बनकर इन तक पहुंचने की दिशा में अग्रसर है।
Comments
Post a Comment