लोगों की आस्था की प्रतिमूर्ति है– हमारे राम।
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता।।
लगभग 500 वर्ष पूर्व कही गई यह बात आज भी उतनी ही सार्थक,उचित और प्रासंगिक है। जितनी वह तब थी। भगवान राम की कथा विभिन्न प्रकार से हजारों वर्षों से कहीं जा रही है।भगवान राम युगों - युगों से हमारे देश ही नहीं बल्कि दूनिया के अनेक देशों में जन आस्था के केंद्र में रहे हैं। देश दुनिया के संतों, चिंतकों और विचारकों ने राम पर बहुत कुछ लिखा है।
महर्षि वाल्मीकि, तुलसीदास, संत कबीर से लेकर गुरुनानक देव,मीरा, महाकवि केशव, निराला, मैथिलीशरण गुप्त, महात्मा गांधी आदि सब ने अपने-अपने ढंग से लिखा है। युगों- युगों से राम नाम की आस्था का प्रवाह अविरल रहा है। महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में राम अवतार के उद्देश्य और सिद्धांत को सुंदर ढंग से प्रतिपादित किया है उन्होंने राम को आतिमानवीय रूप में देखा है। गोस्वामी तुलसीदास ने तो राम को सुख-दुख, करुणा, अन्याय से लड़ने के लिए संघर्ष तक करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में चित्रित किया है उनके राम मानवीय-मूल्यों, मर्यादाओं और आदर्शो के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से तुलसी ने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे उदात्त आदशों को प्रतिष्ठित किया। रामचरितमानस उत्तर भारत की जनता के बीच बहुत लोकप्रिय है।यही वजह है कि रामचरितमानस के राम घर-घर में बस गए हैं।
कबीर के राम निर्गुण राम है। उनके राम तो नाम साधना के प्रतीक है। उनके राम किसी संप्रदाय जाति या देश की सीमाओं में कैद नहीं है। वह अलख, अविनाशी परमतत्व ही राम है। उनके राम मनुष्य और मनुष्य के बीच किसी भेदभाव के कारक नहीं है। वह तो प्रेमतत्व के प्रतीक हैं।
गांधी के राम सत्य के प्रति उनके प्रबल विश्वास का प्रतीक थे। गांधी के राम उनके प्रेरणाश्रोत थे। रामराज्य की कल्पना को स्पष्ट करते हुए 1929 के यंग इंडिया' के संस्करण में गांधी जी ने लिखा था 'रामराज्य' अर्थात-जहां अत्योदय की प्रकृति राज करती हो। ग्रंथों में जिस रामराज्य की चर्चा है वह वास्तविक लोकतंत्र है। जब कोई सर्वोन्मुखी होकर सभी के दुःख-सुख और आवश्यकताओं को अपना मान लेता है, जो राजा और रंक में बिना भेद के न्याय करता है, वह राजकार्य का सबसे उपयुक्त उत्तराधिकारी होता है। वास्तव में यही सिद्धांत गांधी का रामराज्य है। रामायण कहती है-ब्रह्मर्षि विश्वामित्र राजपरिवार में जन्मे राम को, उनके पिता दशरथ से मांगकर वन ले गये थे। उनका उद्देश्य सद्कार्यों की रक्षा में असुरों के संहार में राम की भूमिका सुनिश्चित करना था। इसके बाद रावण वध कर के ही राम अयोध्या लौटते हैं। लेकिन यहां एक दर्शन छिपा है। राजठाठ ही राजा और प्रजा में दूरी स्थापित करता है। विश्वामित्र जानते थे कि राम यदि राज-जीवन में पले-बढ़े तो एक आदर्श राजा की उपयोगिता को पूरा नहीं कर पायेंगे। यह समझ विकसित करने के लिये उन्हें सबसे एकाकार होना होगा। कष्ट निवारण के लिये, पीड़ा का स्वाद चखना होगा। न्याय देने के लिये अन्याय की कठोरता सहनी होगी। युद्ध विजय के लिये सेना के बिना, घाव सहने होंगे और निरंतर सहने होंगे। ऐसा नहीं है कि राजा बनने के बाद आपको इनसे मुक्ति मिल जायेगी। यहां जय-पराजय का प्रश्न नहीं है बल्कि योग्य शासक के यही मानदंड होते हैं। ब्रह्मर्षि की इस कसौटी पर राम खरे उतरते हैं। जब वे वन जाते हैं तो रथ त्याग कर मुनिवेश धर, गुरु के साथ पैदल ही चलते हैं। वास्तव में यहीं से रामराज्य की झलक
दिखनी प्रारंभ हो जाती हैं। राम प्रत्येक क्षण धर्म, सत्य और न्याय का ध्यान रखते हैं। यही कारण है कि समाज के सबसे पिछड़े वर्ग से भी
संवाद स्थापित कर पाते हैं। अन्यथा वह समाज उन्हें स्वीकार ही नहीं करता। इसीलिये गांधी ने राम को आदर्श माना। कल्पना करिये, गांधी गाड़ी में बैठकर डांडी मार्च या सत्याग्रह का आंदोलन करते तो क्या वे सभी आंदोलनों को जनांदोलन बना पाते? पैदल चलकर, गांव-गांव रहकर, ग्रामीणों को अपने साथ मिलाकर गांधी का बढ़ाया हुआ एक-एक कदम पूरे भारत में जनांदोलन बन उठा। त्रेता के राम की वनयात्रा से लेकर गांधी की पदयात्रा तक एक ही दर्शन है-सर्वोदय। रामायण राम को एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति, आदर्श पिता और आदर्श राजा के रूप में स्थापित करती है। गांधी इसी आदर्श राम के उपासक थे। गांधी का मानना था कि 'सत्य के उपासक के लिये मौन अध्यात्मिक अनुशासन का अंग हैं और चे स्वयं इसका अक्षरशः पालन करते थे। समाज के निम्न, पिछड़े और वनवासी के कल्याण के लिये राम की करुणा के समान प्रवाह गांधी की धमनियों में भी था। गांधी ने अपने जीवन के सभी प्रयोगों के परिणामों और प्रार्थनाओं में सत्य के होने का ही अनुभव किया। सत्य के प्रति गांधी के प्रयोगों के भाव में उनके राम ही है।
राम शब्द इतना व्यापक है कि साहित्य में परमात्मा के लिए इसके समकक्ष केवल एक शब्द ही आता है- 'रमते इति रामः' जो कण-कण में रमते हों उसे राम कहते हैं।
अमृता राव
शोधार्थी(काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
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