राहुल सांकृत्यायन
‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’, जैसा क्रांतिकारी नारा देने वाले दुनिया के सबसे बड़े घुमक्कड़ नेता महाविद्रोही,महापंडित राहुल संस्कृत्यायन दार्शनिक , विचारक, इतिहासकार, पुरातत्वेता, साहित्यकार भाषा शास्त्री और मार्क्सवाद प्रचारक हो ने के साथ ही एक लोकप्रिय जननेता भी थे।स्वाधीनता आंदोलन और बिहार के किसानो के आंदोलन में उन्होंने प्रत्यक्षकारी भूमिका निभाई। राहुल सांकृत्यायन की परंपरा सतत प्रगति और प्रयोग तथा सामाजिक सांस्कृतिक क्रांति के अविरल प्रवाह एवं जनता से अटूट जुड़ाव की परंपरा है।
राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893 – 14 अप्रैल 1963) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। वह वेदान्ती, आर्य समाजी, बौद्ध मतावलंबी से होते हुए मार्क्सवादी बने। विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने पूरी तरह से ब्राहमणवादी जातिवादी हिंदू–संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया। फुले और आंबेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का व्यक्तिगत तौर पर तो सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिंदुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी। राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिंदुओं को सीधे ललकारते थे, उनकी पतनशीलता और गलाजत को उजागर करते थे। वे अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिंदुओं के समाज, संस्कृति, धर्म, भगवान, सदाचार, जात–पांत के अमानवीय चेहरे को बेनकाब करते हैं। वे स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित एक उन्नत समाज का सपना देखते हैं।
राहुल सांकृत्यायन ने अपनी आत्मकथा में स्पष्ट किया है कि वह राजनीतिक प्राणी नहीं थे यानी राजनीति के प्रति उनमें स्वाभाविक आकर्षण नहीं था। पर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति, और वह भी उनके जैसा जीवन-जगत से सरोकार रखने वाला देश में विदेशी राज के विरुद्ध उद्वेलित हो यह स्वाभाविक था। वह उस तरह के बुद्धिजीवी नहीं थे जो दुखी लोगों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उनकी कभी-कभी मदद करके संतृप्त हो जाते हैं। वह स्वयं भी किसान थे और खासतौर से किसानों के दोहरे दमन-उत्पीड़न, सरकार द्वारा और जमीदारों, के विरुद्ध सक्रिय हो गए। उनके जैसा व्यक्ति केवल ऊपर से नेतृत्व कर दायित्व का निर्वाह नहीं कर सकता था। वह तृण-मूल कार्यकर्त्ता की तरह आंदोलन में शामिल रहे।
वह स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे। कांग्रेस के अधिवेशनों में गए। जिला कमेटी के सेक्रेटरी भी बनाए गए। खादी और चर्खे का प्रचार करने गाँव-गाँव घूमें। पर गांधी जी की राजनीति से कभी अभीभूत नहीं हुए- उनके व्यक्तित्व से भी नहीं। वह धीरे-धीरे मार्क्सवाद से प्रभावित होते जा रहे थे क्योंकि एक ओर उस विचार के उन्हें बेहतर जन-सरोकार दिखाई देता था तो दूसरी ओर सोवियत यूनियन की सफलताएं भी उन्हें प्रभावित करती थी। अन्ततः वह कम्युनिस्ट बन गए पर वह किसी मामले में कट्टरपंथी नहीं हो सकते थे। वह पार्टी के अन्धानुयायी नहीं थे। राहुल ने यशपाल से बात करते हुए तीन नतीजे निकाले थे।
एक अभियान के बाद क्रांतिकारी अपने मुहिम के प्रति उदासीन हो जाते हैं।
किसान-मजदूर वर्ग में जो पैदा हुए वह जरूरी नहीं कि क्रांतिकारी ही हो। अक्सर मुद्दों के अनुसार उनका मतभेद भी होता रहता था। एक बाद उन्हें पार्टी छोड़ना भी पड़ा। डॉ. राम विलास शर्मा उनके कटु आलोचक बन गए थे, परन्तु उनके मन में अपने आलोचकों और पार्टी के लिए कोई कटुता नहीं पैदा हुई। वह एक कम्युनिस्ट की तरह ही मरना चाहते थे, और ऐसा ही हुआ, क्यों कि उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया गया।
उनके मन में धनिकों के प्रति एक पूर्वाग्रह सा समा गया था। इसीलिए वह जवाहर लाल नेहरू से भी प्रभावित नहीं थे। इलाहाबाद प्रवास के लिए लालायित नहीं रहते थे। यहाँ तक जवाहर लाल नेहरू ने उनसे मिलने की इच्छा व्यक्त की। तब भी वह उत्साहित नहीं हुए।
राजनीति एक ऐसा खेल है जिसमें ‘फेयाप्ले’ हमेशा संभव नहीं होता और राहुल में न्याय और सद्कर्म को लेकर कट्टर नैतिकता थी। इसलिए धीरे-धीरे वह राजनीति से उदासीन होते गए और अपने पठन-पाठन-शिक्षण में रमते गए। उनका कहना था, ‘मैं राजनीति में अपने हृदय की पीड़ा दूर करने आया था। गरीबी और अपमान को मै। अभिशाप समझता था।’ पर धीरे-धीरे उन्हें लगा था कि वह स्वयं ऐसा कर पाने में समर्थ नहीं हैं।
राहुल सांस्कृत्यायन का जीवन एक सतत यात्रा थी।जिस प्रकार उनके पांव कभी नहीं चुके उसी प्रकार उनकी कलम भी नहीं रुकी। विभिन्न विषयों पर उन्होंने ढेर सौ से अधिक पुस्तकें लिखी।आज जब सर्वाग्रसी संकट से ग्रस्त हमारा समाज गहरी निराशा,गतिरोध और जड़ता के अंधेरे गर्त में पड़ा हुआ है ,जहां पुरातन पंथी मूल्यों – मान्यताओं और रूढ़ियों से समाज ग्रसित है तब राहुल सांस्कृत्यायन का रूढ़ीभंजक साहसिक और आवेगमय प्रयोगधर्मा व्यक्तित्व प्रेरणा का स्रोत बनकर सामने आता है। आज राहुल सांस्कृत्यायन की वैज्ञानिक जीवन दृष्टि के अथक प्रचारक व्यक्तित्व से सीखने की जरूरत है,उनकी लोकोन्मुख तत्परता से सीखने की जरूरत है और सिद्धांत और व्यवहार में वैसी एकता कायम करने की जरुरत है।आज जिस नए क्रांतिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की जरूरत है उसकी तैयारी करते हुए राहुल जी जैसे इतिहास पुरुष का व्यक्तित्व हमारे मानस को सर्वाधिक आंदोलित करता है।
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